यदि सब कुछ नियमों से चलता है तो ईश्वर की आवश्यकता कहाँ है ?
न्यूटन का वाक्य प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर का निषेध नहीं करता पर अप्रत्यक्ष रूप से एक गहरी दार्शनिक बेचैनी उत्पन्न करता है। यहीं से ईश्वर अनुभव से खिसककर परिकल्पना बनता है और धीरे-धीरे एक ऐसा ‘घड़ीसाज़’ रह जाता है जो सृष्टि बनाकर स्वयं उससे अलग हो गया। जब आइज़ैक न्यूटन ने यह संकेत दिया कि ब्रह्मांड नियमों से चलता है तो उसने केवल विज्ञान का एक नया अध्याय नहीं खोला, उसने मनुष्य की ईश्वर-समझ को भी एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया। यह विचार आधुनिक यूरोप के लिए क्रांतिकारी था क्योंकि वहाँ ईश्वर अब तक धर्मग्रंथों, चर्च और चमत्कारों में कैद था। न्यूटन ने उसे नियमों की गरिमा दी पर उसी क्षण उसे जीवंत उपस्थिति से भी वंचित कर दिया। पर प्रश्न यह है—
क्या यही ईश्वर की अंतिम परिभाषा है?
क्या ईश्वर केवल वह है जो कभी था, अब नहीं?
क्या चेतना केवल नियमों की उपज है?
क्या अनुभव, प्रार्थना, ध्यान—सब केवल मनोवैज्ञानिक भ्रम हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए यूरोप को तीन शताब्दियाँ लग गईं—हॉकिंग, डॉकिन्स, नीत्शे और फ्रायड तक। पर यही प्रश्न भारत में न्यूटन से बहुत पहले पूछे और सुलझाए जा चुके थे। भारतीय दर्शन ने कभी यह मानकर आरंभ नहीं किया कि “ईश्वर कोई बाहरी निर्माता है”। यहाँ सृष्टि को निर्मित वस्तु नहीं, प्रकट हुई चेतना माना गया। वेदों में सृष्टि की शुरुआत किसी आदेश से नहीं, एक अकथनीय मौन से होती है। उपनिषदों में “ईश्वर किसी सिंहासन पर बैठा शासक नहीं” बल्कि अंतर्यामी है जो नियमों को बनाता नहीं बल्कि नियमों में निवास करता है। जहाँ न्यूटन का ईश्वर घड़ी बनाकर विश्राम करता है वहाँ भारतीय ईश्वर क्षण-क्षण सृष्टि में जाग्रत रहता है। जहाँ न्यूटन का ईश्वर मानव अनुभव से बाहर है, वहाँ भारतीय ईश्वर अनुभव का ही चरम रूप है।
इसलिए यह अध्याय न्यूटन के विज्ञान का खंडन नहीं करता बल्कि उसके दार्शनिक निष्कर्ष को एक व्यापक चेतना-परिप्रेक्ष्य में रखता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि न्यूटन सही थे या गलत। प्रश्न यह है कि क्या नियम अंतिम सत्य हैं या चेतना उनसे भी गहरी कोई सत्ता है? इसी प्रश्न के उत्तर में यह अध्याय न्यूटन के घड़ीसाज़ से आगे बढ़कर भारतीय प्रत्युत्तर तक पहुँचता है जहाँ ईश्वर न तो सृष्टि के भीतर सीमित है, न सृष्टि के बाहर अनुपस्थित, बल्कि—
“सृष्टि के बाहर खड़ा होकर भी सृष्टि में पूर्णतः व्याप्त है।“
यहीं से इस ग्रंथ की वैचारिक यात्रा आरंभ होती है। 17वीं शताब्दी में आधुनिक विज्ञान का उदय केवल प्राकृतिक नियमों की खोज तक सीमित नहीं था बल्कि उसने ईश्वर, सृष्टि और चेतना जैसे प्रश्नों को भी एक नई दार्शनिक दिशा दी। इस परिवर्तन का केंद्रीय व्यक्तित्व आइज़ैक न्यूटन था। न्यूटन ने गति, गुरुत्वाकर्षण और गणितीय नियमों द्वारा ब्रह्मांड को एक “नियत, गणनीय और यांत्रिक व्यवस्था” के रूप में प्रस्तुत किया। यहीं से वह अवधारणा जन्म लेती है जिसे आगे चलकर “घड़ीसाज़ ईश्वर” कहा गया।
यह अध्याय न्यूटन के वैज्ञानिक-दार्शनिक दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है और उसके समांतर भारतीय दर्शन के उस नियत, गणनीय और यांत्रिक व्यवस्था उत्तर को रखता है जहाँ ईश्वर न केवल सृष्टिकर्ता है बल्कि सचेत, अनुभूति-गम्य और सदा क्रियाशील सत्ता है।
न्यूटन और ब्रह्मांडीय नियम: एक समग्र विवेचन
इस अध्याय में आइज़ैक न्यूटन के ब्रह्मांड-दृष्टिकोण को उसके ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया। न्यूटन का मुख्य आग्रह यह था कि “ब्रह्मांड अराजक नहीं है” बल्कि “निश्चित नियमों के अनुसार संचालित होता है”। यह विचार अपने समय के लिए अत्यंत प्रभावशाली था क्योंकि इससे प्रकृति को समझने का एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक मार्ग खुला किन्तु जब इन नियमों को ही अंतिम और आत्मनिर्भर मान लिया गया तब एक नई समस्या सामने आई। ईश्वर की भूमिका धीरे-धीरे केवल एक प्रारंभिक निर्माता तक सीमित दिखाई देने लगी—जैसे कोई घड़ीसाज़ घड़ी बनाकर उसे अपने आप चलने के लिए छोड़ देता है। इसी कारण यूरोप में “घड़ीसाज़ ईश्वर” की धारणा चर्चा का विषय बनी।
समय के साथ यूरोप के कई दार्शनिकों ने इस विचार की सीमाओं की ओर संकेत किया। कुछ ने इसे ईश्वर की पूर्णता के विरुद्ध माना तो कुछ ने यह कहा कि ईश्वर केवल निर्माता नहीं बल्कि सृष्टि का सक्रिय संचालक भी है। इन बहसों से यह स्पष्ट हुआ कि ब्रह्मांड को केवल यांत्रिक नियमों के आधार पर समझना सरल नहीं है। फिर भी इस पूरे विमर्श में एक मूल प्रश्न बना रहा—
“क्या नियम स्वयं पर्याप्त हैं या उनके पीछे किसी गहरे चेतन आधार की आवश्यकता है?”
यहीं से यह चर्चा भारतीय दर्शन के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय दार्शनिक परंपरा ने बहुत पहले ही यह प्रश्न उठाया था कि प्रकृति के नियम और चेतना का संबंध क्या है। “उपनिषदों” और अन्य “दार्शनिक ग्रंथों” में यह विचार मिलता है कि नियम किसी बाहरी सत्ता से अलग नहीं हैं बल्कि उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति हैं जिसे “ब्रह्म” कहा गया है।
इस प्रकार पश्चिम में जो प्रश्न न्यूटन के बाद उठे, वे भारतीय दर्शन में पहले से ही विचार का विषय रहे हैं। इसलिए भारतीय चिंतन केवल प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र दार्शनिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। इसी बिंदु से अगले अध्याय की चर्चा आरंभ होती है जहाँ भारतीय दार्शनिकों की दृष्टि से इस प्रश्न का परीक्षण किया जाएगा—क्या ब्रह्मांड को केवल नियमों से समझा जा सकता है, या उसके पीछे किसी मूल चेतना का होना आवश्यक है?
नियम नहीं, चेतना मूल है—भारतीय दर्शन का प्रत्युत्तर
यूरोप के ही कई विचारकों ने इस धारणा पर प्रश्न उठाए। किसी ने इसे ईश्वर की पूर्णता के विरुद्ध माना तो किसी ने कहा कि नियम अपने आप नहीं चल सकते। इन बहसों से यह तो स्पष्ट हुआ कि यांत्रिक दृष्टि पर्याप्त नहीं है परंतु ईश्वर और नियम के बीच का द्वैत वहाँ बना ही रहा। ईश्वर कभी नियमों के बाहर खड़ा शासक रहा, तो कभी आवश्यकता पड़ने पर “हस्तक्षेप करने वाला संचालक”। यहीं से भारतीय दर्शन का दृष्टिकोण प्रासंगिक हो जाता है। भारतीय चिंतन ने कभी यह मानकर विचार आरंभ नहीं किया कि नियम अपने आप में स्वतंत्र सत्ता हैं। यहाँ प्रश्न यह नहीं था कि नियम कैसे बने, बल्कि यह था कि नियम किसमें स्थित हैं। इस परंपरा में चेतना को मूल तत्त्व माना गया—ऐसी चेतना, जिसके भीतर नियम, प्रकृति और कार्य-कारण सभी समाहित हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि कोई जड़ यंत्र नहीं है जिसे बाहर से चलाया जाए। वह चेतना की अभिव्यक्ति है। इसलिए यहाँ ईश्वर न तो “दूर बैठा घड़ीसाज़” है न कभी-कभी हस्तक्षेप करने वाला शासक। वह “अंतर्यामी” है—हर नियम में, हर क्रिया में और हर अनुभव में उपस्थित।
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